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बेशक़!! जो भारतीय अपने आपको हिन्दुस्तानी कहलाना मंज़ूर नहिं करते उन्हें भारत में रहना ही नही चाहिये। बताईये कौन सा मज़हब-धर्म वतन से नफरत सिखाता है? मैं उसे धर्म- मज़हब नहिं क्हुंगी। हम सब भारतीय ही हैं। और रहेंगे। ईस देश को तोडनेवाली ताक़्तों से नफरत है मुझे। मेरा हिन्दुस्तान "महान" है। जहां मेरा जन्म हुआ वो भारत को मेरा सलाम है।
बहुत हीं सही बात कही रजिया ने परन्तु क्या लोग ऐसा समझते हैं ?
बहस में एक और जनाब मंसूर अली पधारे और शुभकामना दे चलते बने :
नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ.....तमाम भारतवासियों को चाहे वोह किसी भी धर्म अथवा जाती का हो . धन्यवाद !
चलो कुल मिलकर बहस सही दिशा में जाती दिख रही है .आपको क्या लगता है ?
पुनः दिनेश जी, मोहन जी को संबोधित करते हुए आपने सधे शब्दों में बातें रखते हैं :
अंतरजाल पर आजकल विवादों का चलन बढ़ गया है . किसी भी बात को लेकर लोग टीका- टिप्पणी शुरू कर देते हैं फ़िर शुरू होता है आरोप -प्रत्यारोप का दौर . चिट्ठों पर तो दर्जनों पोस्ट व्यक्तिगत लड़ाई में लिखी जा रही है .और गौर करें तो अक्सर बहस हिन्दू -मुस्लिम की ओर , महिला-पुरुष , दलित-सवर्ण की ओर पहुँच जाती है भले ही मुद्दा कुछ भी हो .लेकिन कुछेक सार्थक बहस भी हो रही है उदाहरण के लिए 'हिंदी भाषा' पर चल रहे इस विवाद को हीं लीजिये :
एक सज्जन दिनेश सरोज ने शुभकामना क्या भेजी बबाल हो गया :
हर दुआ कुबूल हो आपकी,
हर तमन्ना साकार हो,
महफिलों सी रहे रोशन जिंदगी,
कभी न जीवन में वीरानी हो,
हमारे तरफ से आप सभी को
"नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ"/"ईद मुबारक हो!!"
शुभकामना सन्देश को पढ़कर मोहन भैया ने ये कहा :
नवरात्र की शुभकामनाये तो ठीक है पर दूसरी ....? क्यों ? जबकि 15 अगस्त और 26 जनवरी को उनकी भीड़
इतनी नहीं होती जितना वो लोग ताजमहल और रोड्स पर करते है ,,,,? इसका क्या मतलब हुआ यह समझ के बाहर है ? साथ ही वे लोग हमारे किसी त्यौहार की शुभकामनायें पब्लिकली नहीं देते ....? सोचिये .....वर्ना जो लोग पोलियो ड्रोप्स / परिवार निओजन / नागरिकता के बारे में घम्भीर नहीं है और दिन दूनी रत चौगुनी अपनी संख्या बढा रहे हैं और यही रफ्तार रही तो बहुत जल्दी वो ही दिखेंगे भारत में हम नहीं रहेंगे ....जैसा कुछ दिन पहले इंडियन मुजाहिद्दीन ने हमारे न्यूज़ पपेर्स में विगय्प्ती प्रकाशित करवाई की 5 साल में भारत से हिंदूं का नाम निशान मिटा देंगे ..? कहाँ है हमारी भारतीयता की भावना ....नागरिकता की भावना ..? या गुलामी और मस्का परस्त ही हमारी पहचान बन गई है ....?
-एक भारतीय नागरिक .
मोहन भैया ने परिवार नियोजन की बात तो सही कही है लेकिन ईद की शुभकामना पर सवाल उठाना उचित नहीं लगता . हमें कोई काम नहीं पसंद तो ना करें पर दूसरों को रोक नहीं सकते .
आगे चलिए रजिया मिर्जा अपनी प्रतिक्रिया में कहती हैं :
बहुत हीं सही बात कही रजिया ने परन्तु क्या लोग ऐसा समझते हैं ?
बहस में एक और जनाब मंसूर अली पधारे और शुभकामना दे चलते बने :
नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ.....तमाम भारतवासियों को चाहे वोह किसी भी धर्म अथवा जाती का हो . धन्यवाद !
चलो कुल मिलकर बहस सही दिशा में जाती दिख रही है .आपको क्या लगता है ?
पुनः दिनेश जी, मोहन जी को संबोधित करते हुए आपने सधे शब्दों में बातें रखते हैं :
प्रिय मोहनजी,
आपकी वतनपरस्ती एवं उससे जुडी चिंता के लिये आपको सलाम!!!
आपकी चिंता एवं उसके उपलक्ष्य में आपने जो ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात कही है मैं भी उससे इत्तेफाक रखता हूँ| परन्तु १५ अगस्त एवं २६ जनवरी में इकठ्ठे भीड़ में से आप किसी हिन्दू, मुस्लिम या किसी ईसाई को पृथक कैसे कर पायेंगे? क्या ऐसा कोई चस्मा है? क्या कहीं भीड़ के आंकड़े निर्दिष्ट किये हुए है? या हम बस ऐसा मान लेते है और अपने मन में अवधारणा बना लेते है|
जब आप ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात करते हैं, तब शायद आप यह भूल जाते है या यूँ कहे की नजरअंदाज कर देते है की उससे कहीं कहीं ज्यादा भीड़ मुंबई एवं अन्य जगहों पर गणेश पंडालों में गणेश जी के दर्शन के लिए उमड़ती है तथा चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन करने आये श्रध्हलुओं की होती है, जिसे संभालना प्रशासन के लोगों के लिए सिरदर्द बन जाता है| मुंबई के जन्माष्टमी को भी शायद आप भूल गए जिसमे इस बार swine flu के संक्रमण के भय के बावजूद भी भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी| एसे और भी कई उधाहरण मैं प्रस्तुत कर सकता हूँ जैसे कुम्भ का मेला ईत्यादी| क्या आपने कभी क्रिकेट मैच में जुटे भीड़ को उनके जाती-धर्म के आधार पर आंकने की कोशिश की है?
आज भारत देश एक धर्म निरपेक्ष देश के रूप में अपनी संप्रभुता बना चुका है.... और भारतीय संविधान ने सभी धर्मों को उनकी संप्रभुता और स्वतंत्रता बनाये रखने का पुर-पूरा अधिकार दिया है|
और इसपर न ही आप ना ही मैं और ना ही कोई और प्रश्न उठा सकता है|
और रही "इंडियन मुजाहिद्दीन" के ५ सालों में हिन्दुओं का नामों निशां मिटाने की तो उसके लिए आप निश्चिंत रहें.... ऐसी कोशिशे सदियों से होती आ रही हैं पर सदा ही नाकाम भी होती रही हैं!!! भारतीय संस्कृति इतनी उदार और परिपक्कव है की यह सभी को अपने में समाहित कर लेती है!!!
कोई भी जागरूक माता-पिता अपने बच्चों को पोलियो टिका से वांच्छित नहीं रखेंगे .... और यदि कोई रखता है तो मैं समझता हूँ वे नासमझ हैं, उन्हें जागरुक बनाने की जरुरत है| इसे धर्म-जाती के आधार से देखना मुझे तर्क सांगत लगता है| और यदि कोई धार्मिक गुरु पोलियो टिका न देने की सलाह या फतवा देता है तो मैं इसे धर्मान्धता और अज्ञानता ही कहूँगा|
परिवारनियोजन एक गंभीर मुद्दा है, जिस तरह जनसँख्या विस्फोट हो रहा है यह निकट भविष्य के लिए बहुत ही बड़ी समस्या बनता जा रहा है| पर मैं फिर कहना चाहूँगा इस विषय को भी एक रंग के चश्मे से न देखें| आपको केवल मुस्लिम परिवार ही नहीं अपितु हर धर्म के परिवार मिल जायेंगे जो बच्चों को ईश्वर का रूप कहते हैं और परिवार नियोजन के नाम से कन्नी काटते हैं| मैंने एक हिन्दू धर्मगुरु (किसी का नाम नहीं लेना चाहूँगा) के पुस्तक में उन्हें यह सन्देश देते पाया है की भारत देश में हिन्दुओं की संख्या बढाइये सरकार के परिवार नियोजन को तवज्जो न दें? इसके बारे में आप क्या कहेंगे??? मैं तो इसे धर्मान्धता ही कहूँगा फिर चाहे कोई भी धर्म गुरु ऐसा क्यों न कहे|
रही भारतीय नागरिकता की बात, तो भाईजी, तो जो मुस्लिम खुद को भारतीय या हिन्दुस्तानी कहलाना पसंद नहीं करते थे (या जैसी भी परिस्थिति रही हो) १९४७ में ही भारत छोड़ चले गए थे| और जो देश छोड़ कर नहीं गए यहीं रह गए आप उन्हें देशप्रेमी कहने के बजाय उन्हें एक विशेष रंग के चश्में से देख रहे हैं!!! यह कहाँ तक तर्कसंगत है??? आप यह भूल जाते हैं की मुस्लिमों के आलावा कुछ गैर मुस्लिम (हिन्दू, सिख एवं अन्य) १९४७ में भारत नहीं आये थे और जहां थे वहीँ बसे रहे, उन्हें अपनी जन्मभूमि से प्रेम था चाहे अब वह अखंड भारत देश का हिस्सा न रहा हो| उनका मैं सम्मान करता हूँ| और जो मुस्लिम यहाँ रह गए हैं उनका भी सम्मान करता हूँ|
कृपया हमारे राजनीतिज्ञों एवं तथाकथित कट्टरपंथीयों की तरह अखंड भारत देश को जाती-धर्म के चश्में से मत देखें| कम से कम मैं इतना कह ही सकता हुं की मेरे जितने भी गैर हिन्दू मित्र या जानने वाले लोग हैं वे मुझे हर हिंन्दु धार्मिक त्योहारों की शुभकामना के साथ साथ स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की बधाई देते है| और मैं इसी पर विश्वास करता हुं| और तो और कुछ तो मेरे साथ मंदिरों में आकर प्रार्थना करने में जरा भी संकोच नहीं करते| और मैं स्वयं भी दरगाहों, मजारों, गिरिजाघरों में उसी श्रध्दा से जाता हूँ जैसे की मंदिरों में|
मैं सर्वधर्म समभाव में यकीन रखता हूँ, और हर धर्म को सामान रूप से आदर भी देता हूँ| और मेरा सभी महानुभावों से निवेदन है की मानव धर्म को सभी जाती-धर्मों से सर्वोपरि समझे| वैस हर इंसान अपनी विचारधारा के लिए स्वतंत्र है| सुनी-सुनाई बातों में कितना सत्य है या कितनी छलावा यह मैं नहीं कह सकता| hindibhasha Group पर भी गैर हिन्दू मित्र हिन्दू त्योहर्रों की बधाई देते रहे हैं यह तो आपने भी देखा होगा|
अंत में मैं यह भी कहना चाहूँगा की बिना आग के धुआं नहीं निकलता, कुछ चंद मुठ्ठी भर एसे लोग भी यकीनन हैं जो भारत देश की संप्रभुता को क्षति पहुँचाने में जुटे हुए हैं और लगातार प्रयास करते रह रहे हैं, जिस कारण हमें अक्सर कई आतंकवादी हमलों एवं सांप्रदायिक तनाव का सामना करना पड जाता है| परन्तु किसी परिवार के रसोई घर के चूल्हे में लगी आग से निकले धुएँ को किसी आतंकी हमले में हुए विस्फोटों का धुंआ समझ लेना कितना तर्कसंगत है???
मैं किसी के भावना को आघात पहुँचाना नहीं चाहता, और यदि जाने अनजाने ऐसा कुछ हुआ हो तो क्षमा प्रार्थी हुं!!!
रहीमन धागा प्रेम का,मत तोड़ो चटाकाई|टूटे से फिर ना जुड़े,जुड़े गाँठ परि जाई|| जय हिंद !!!
आपकी वतनपरस्ती एवं उससे जुडी चिंता के लिये आपको सलाम!!!
आपकी चिंता एवं उसके उपलक्ष्य में आपने जो ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात कही है मैं भी उससे इत्तेफाक रखता हूँ| परन्तु १५ अगस्त एवं २६ जनवरी में इकठ्ठे भीड़ में से आप किसी हिन्दू, मुस्लिम या किसी ईसाई को पृथक कैसे कर पायेंगे? क्या ऐसा कोई चस्मा है? क्या कहीं भीड़ के आंकड़े निर्दिष्ट किये हुए है? या हम बस ऐसा मान लेते है और अपने मन में अवधारणा बना लेते है|
जब आप ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात करते हैं, तब शायद आप यह भूल जाते है या यूँ कहे की नजरअंदाज कर देते है की उससे कहीं कहीं ज्यादा भीड़ मुंबई एवं अन्य जगहों पर गणेश पंडालों में गणेश जी के दर्शन के लिए उमड़ती है तथा चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन करने आये श्रध्हलुओं की होती है, जिसे संभालना प्रशासन के लोगों के लिए सिरदर्द बन जाता है| मुंबई के जन्माष्टमी को भी शायद आप भूल गए जिसमे इस बार swine flu के संक्रमण के भय के बावजूद भी भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी| एसे और भी कई उधाहरण मैं प्रस्तुत कर सकता हूँ जैसे कुम्भ का मेला ईत्यादी| क्या आपने कभी क्रिकेट मैच में जुटे भीड़ को उनके जाती-धर्म के आधार पर आंकने की कोशिश की है?
आज भारत देश एक धर्म निरपेक्ष देश के रूप में अपनी संप्रभुता बना चुका है.... और भारतीय संविधान ने सभी धर्मों को उनकी संप्रभुता और स्वतंत्रता बनाये रखने का पुर-पूरा अधिकार दिया है|
और इसपर न ही आप ना ही मैं और ना ही कोई और प्रश्न उठा सकता है|
और रही "इंडियन मुजाहिद्दीन" के ५ सालों में हिन्दुओं का नामों निशां मिटाने की तो उसके लिए आप निश्चिंत रहें.... ऐसी कोशिशे सदियों से होती आ रही हैं पर सदा ही नाकाम भी होती रही हैं!!! भारतीय संस्कृति इतनी उदार और परिपक्कव है की यह सभी को अपने में समाहित कर लेती है!!!
कोई भी जागरूक माता-पिता अपने बच्चों को पोलियो टिका से वांच्छित नहीं रखेंगे .... और यदि कोई रखता है तो मैं समझता हूँ वे नासमझ हैं, उन्हें जागरुक बनाने की जरुरत है| इसे धर्म-जाती के आधार से देखना मुझे तर्क सांगत लगता है| और यदि कोई धार्मिक गुरु पोलियो टिका न देने की सलाह या फतवा देता है तो मैं इसे धर्मान्धता और अज्ञानता ही कहूँगा|
परिवारनियोजन एक गंभीर मुद्दा है, जिस तरह जनसँख्या विस्फोट हो रहा है यह निकट भविष्य के लिए बहुत ही बड़ी समस्या बनता जा रहा है| पर मैं फिर कहना चाहूँगा इस विषय को भी एक रंग के चश्मे से न देखें| आपको केवल मुस्लिम परिवार ही नहीं अपितु हर धर्म के परिवार मिल जायेंगे जो बच्चों को ईश्वर का रूप कहते हैं और परिवार नियोजन के नाम से कन्नी काटते हैं| मैंने एक हिन्दू धर्मगुरु (किसी का नाम नहीं लेना चाहूँगा) के पुस्तक में उन्हें यह सन्देश देते पाया है की भारत देश में हिन्दुओं की संख्या बढाइये सरकार के परिवार नियोजन को तवज्जो न दें? इसके बारे में आप क्या कहेंगे??? मैं तो इसे धर्मान्धता ही कहूँगा फिर चाहे कोई भी धर्म गुरु ऐसा क्यों न कहे|
रही भारतीय नागरिकता की बात, तो भाईजी, तो जो मुस्लिम खुद को भारतीय या हिन्दुस्तानी कहलाना पसंद नहीं करते थे (या जैसी भी परिस्थिति रही हो) १९४७ में ही भारत छोड़ चले गए थे| और जो देश छोड़ कर नहीं गए यहीं रह गए आप उन्हें देशप्रेमी कहने के बजाय उन्हें एक विशेष रंग के चश्में से देख रहे हैं!!! यह कहाँ तक तर्कसंगत है??? आप यह भूल जाते हैं की मुस्लिमों के आलावा कुछ गैर मुस्लिम (हिन्दू, सिख एवं अन्य) १९४७ में भारत नहीं आये थे और जहां थे वहीँ बसे रहे, उन्हें अपनी जन्मभूमि से प्रेम था चाहे अब वह अखंड भारत देश का हिस्सा न रहा हो| उनका मैं सम्मान करता हूँ| और जो मुस्लिम यहाँ रह गए हैं उनका भी सम्मान करता हूँ|
कृपया हमारे राजनीतिज्ञों एवं तथाकथित कट्टरपंथीयों की तरह अखंड भारत देश को जाती-धर्म के चश्में से मत देखें| कम से कम मैं इतना कह ही सकता हुं की मेरे जितने भी गैर हिन्दू मित्र या जानने वाले लोग हैं वे मुझे हर हिंन्दु धार्मिक त्योहारों की शुभकामना के साथ साथ स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की बधाई देते है| और मैं इसी पर विश्वास करता हुं| और तो और कुछ तो मेरे साथ मंदिरों में आकर प्रार्थना करने में जरा भी संकोच नहीं करते| और मैं स्वयं भी दरगाहों, मजारों, गिरिजाघरों में उसी श्रध्दा से जाता हूँ जैसे की मंदिरों में|
मैं सर्वधर्म समभाव में यकीन रखता हूँ, और हर धर्म को सामान रूप से आदर भी देता हूँ| और मेरा सभी महानुभावों से निवेदन है की मानव धर्म को सभी जाती-धर्मों से सर्वोपरि समझे| वैस हर इंसान अपनी विचारधारा के लिए स्वतंत्र है| सुनी-सुनाई बातों में कितना सत्य है या कितनी छलावा यह मैं नहीं कह सकता| hindibhasha Group पर भी गैर हिन्दू मित्र हिन्दू त्योहर्रों की बधाई देते रहे हैं यह तो आपने भी देखा होगा|
अंत में मैं यह भी कहना चाहूँगा की बिना आग के धुआं नहीं निकलता, कुछ चंद मुठ्ठी भर एसे लोग भी यकीनन हैं जो भारत देश की संप्रभुता को क्षति पहुँचाने में जुटे हुए हैं और लगातार प्रयास करते रह रहे हैं, जिस कारण हमें अक्सर कई आतंकवादी हमलों एवं सांप्रदायिक तनाव का सामना करना पड जाता है| परन्तु किसी परिवार के रसोई घर के चूल्हे में लगी आग से निकले धुएँ को किसी आतंकी हमले में हुए विस्फोटों का धुंआ समझ लेना कितना तर्कसंगत है???
मैं किसी के भावना को आघात पहुँचाना नहीं चाहता, और यदि जाने अनजाने ऐसा कुछ हुआ हो तो क्षमा प्रार्थी हुं!!!
रहीमन धागा प्रेम का,मत तोड़ो चटाकाई|टूटे से फिर ना जुड़े,जुड़े गाँठ परि जाई|| जय हिंद !!!
फिलहाल तो यह बहस जारी है ........................... . क्या ब्लॉगजगत को इस बहस से कुछ सीख लेने की जरुरत है ? सवाल पर जरा मंथन कीजियेगा .
अरे , साहब मैं बेकार की नसीहत नहीं दे रहा हूँ . आपने अपने ब्लॉगजगत की बहस को देखा है तो समझते होंगे . यहाँ ऐसे-ऐसे सूरमा हैं कि बस पूछो मत ! एक जनाब हर जगह धमकी देते हैं ":- फुरसत में आउंगा तेरी तरफ, रोंद डालूंगा तब तक मुंह बंद करले और विचार कर " पर फुर्सत में कब आयेंगे पता नहीं ? पोस्ट कुछ भी बात वहीँ करेंगे जो उनको बकना है . एक दुसरे के नाम से पोस्ट लिख -लिख कर लोकप्रियता की उचाइयों को छूना चाहते हैं ! अब हिंदी चिट्ठों का भगवान् ही मालिक है .
अरे , साहब मैं बेकार की नसीहत नहीं दे रहा हूँ . आपने अपने ब्लॉगजगत की बहस को देखा है तो समझते होंगे . यहाँ ऐसे-ऐसे सूरमा हैं कि बस पूछो मत ! एक जनाब हर जगह धमकी देते हैं ":- फुरसत में आउंगा तेरी तरफ, रोंद डालूंगा तब तक मुंह बंद करले और विचार कर " पर फुर्सत में कब आयेंगे पता नहीं ? पोस्ट कुछ भी बात वहीँ करेंगे जो उनको बकना है . एक दुसरे के नाम से पोस्ट लिख -लिख कर लोकप्रियता की उचाइयों को छूना चाहते हैं ! अब हिंदी चिट्ठों का भगवान् ही मालिक है .
10 comments:
सार्थक विषय लाये है आप ! धन्यवाद !
सही पकड़ा है और चर्चा भी सही हुई है टिप्पणियों के जरिए भई इस पर हमारा भी कहना है कि जो भारत में रहकर भारत की ना सोचे वो हिंदुस्तानी नहीं है चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों ना हो। घूस खाता, भ्रष्ट्राचार फैलाता, गुंडागर्दी करता, आतंक फैलाता किसी भी धर्म का आदमी हो वो हमें नहीं चाहिए।
अरे छकों के हितेषी इधर बडे धार्मिक बन रहे हो उधर प्रवक्ता पर सेक्स चर्चा जिसमें सेक्स तो है ही नहीं समलैंगिको को न्याय की मांग है को रोंद दिया मैंने जा संभाल उसे, यह क्यूं कहता है कब आयेंगे तुम्हें दिन में बताया था रात को आउंगा, ईद मुबारक पर कैरानवी ने भी बहुत सी पोस्टों पर कुछ कहा था, चिकनों की जोडीदार तुझे कहां दिखाई देगा, इस ईद मुबारक कडी में तुम्हें यूं भी लिखना चाहिये था,
रैंक 2 ब्लाग और केवल 3 पोस्टस में Rank-1 ब्लाग नेट जगत को प्रस्तुत करने वाले मुहम्मद उमर कैरानवी seedharasta.blogspot.com की पोस्ट ''ईद मुबारक'' पर लिखते हैं,
''भाई वाकई हमें ईद मुबारक हो कि हम में से अधिकतर ने 30 दिनों तक भूखे रहके भूख को भूखमरी को जाना है, अल्लाह से डरकर नाकि सरकार से अपनी जमा पूंजी का 2.5 प्रतिशत हिसाब लगाकर जकात अथार्त अनिवार्य दान दिया है, अधिकतर ने इस माह में पूरा कुर्आन शरीफ रात की नमाज के बाद सुना है,
पूरे महीने यथासम्भव धर्म पर चलकर सालभर के लिये अपनी धार्मिक सर्विस कराली, ''
signature:
कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि (इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्टा हैं या यह Big game against islam? है
antimawtar.blogspot.com (Rank-1 Blog)
इस्लामिक पुस्तकों के अतिरिक्त छ अल्लाह के चैलेंज
islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)
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@ Nitish Raj - जो आदमी एक तरफ की बात सुने ऐसा हमें भी इण्डिया में नहीं चाहिये, बोलो हम तुम्हारा किया बिगाड लेंगे, मैंने आपका प्रोफाइल देखा लगा समझदार होंगे इसलिये मुखातिब हूं,
मैंने अपनी देश भक्ति कि इन्हें सबूत दिये थे, यह एक भी देश भक्ति का सबूत देदें, खाली समलैंगिकों के हित में यह आदमी सेक्स चर्चा की कडियां लिख रहा है, आज फिर इससे कहता हूं यह अपने को ब्लाग हित, देश हित, धर्म हित में, जनहित साबित करे
उमर चालिसा पहले ही लिखा जा चुका, किसी को पढना हो तो इसी ब्लाग में देखो पोस्ट ''बेशर्म ब्लोग्गरों को कहीं भी घुसे आते हैं ........''
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सभी महानुभावों को सादर नमस्कार,
सबसे पहले यह कहना चाहूँगा की किसी चर्चा-परिचर्चा को विवाद की संज्ञा देना सर्वथा अनुचित समझता हूँ, इसीलिए मेरे द्वारा किये गए टिप्पणी को विवाद संज्ञा से सुशोभित करना मुझे अत्यंत ही कष्टकर लग रहा है|
और एक बात यहाँ स्पष्ट करना चाहूँगा की रजिया जी और मंसूर अली जी की टिप्पणी मेरे द्वारा मोहन जी को दिए गए टिप्पणी के बाद किया गया था, न की पहले जैसा की इस चिठ्ठे में दर्ज किया गया है| आप हिंदी भाषा ग्रुप पर इसे पढ़ सकते हैं.
http://groups-beta.google.com/group/hindibhasha/t/2f071299bfa984fb
मैंने अपने लेखमें भारत देश में परस्पर साम्प्रदायीक सौहाद्र बनाये रखने पर जोर दिया है और यहाँ विचरण करने वाले हर एक सच्चे भारतीय से तहे दिल से गुजारिश है की भारत देश के संस्कृति को फलने फूलने में सहयोग करें, ना की अपने-अपने धर्म की महानता को साबित करने में ध्यान, शक्ति एवं सर्वोपरि समय नष्ट करे..... यही इल्तजा है आप सभी से.....
कृपया इसा लेख को इसके विशुध्ध रूप में ही रहने दे, तथा किसी अन्य लेख एवं टिप्पडी विशेष की रंजिश यहाँ न निकाले....
मैं केवल गुजारिश ही कर सकता हूँ बाकी आपकी बुद्धि एवं विवेक तो आप के साथ ही है....
वन्दे मातरम|
जय हिंद||
दिनेश सरोज'
यदि फुरसत मिले तो इस लेख का मेरा अगला संस्करण मेरे चिठ्ठे पर अवश्य ही पढें|...
क्या भारत वास्तविकता में एक धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतंत्र देश बन पाया है?
http://dineshsaroj.blogspot.com/2009/09/blog-post.html
- दिनेश सरोज
सार्थक पोस्ट के लिए धन्यवाद |
लीजिये जिस चिर - फाड़ वाले को आप याद कर रहे थे वो भी आ गए हैं | अब उन्हीं की सुनते हैं |
महोदय कैरानवी आप निहायत ही घटिया आदमी हैं . आपने अपनी प्रतिक्रिया में जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया है वह आपके टुच्चेपन की निशानी है . कोई और कामधंधा भी है या अरब के पैसों पर पलते हुए बस हर ब्लॉग पर अपनी सड़ी हुई बासी -तेबासी बातों को लेकर पहुँच जाते हो . अगर मर्द हो तो तर्क से इस पोस्ट में लिखे गये तथ्यों को गलत ठहराते . लेकिन तुम्हारे पास तो बस अंतिम अवतार , छ अल्लाह के चैलेंज , जैसी पाषणयुगीन बातों के अलावा कुछ है ही नहीं . पिछले कई दिनों से मैंने हर जगह देखा टालता गया पर आज नहीं हो सका क्या करें ज्यादा बकचोदी बर्दास्त नहीं होती , हर जगह यही लिखते हो :- फुरसत में आउंगा तेरी तरफ, रोंद डालूंगा तब तक मुंह बंद करले और विचार कर" कब आओगे फुर्सत में ? कहाँ रहते हो ? कभी हमें भी दर्शन दो आपकी विद्वत्ता देखने को तरस रहे हैं !
मियां आपके चाहने पर भी आप जैसे बकचोद आदमी के ऊपर पोस्ट नहीं लिखूंगा . तुम्हारे जमात वाले अब तक अपने मकसद में कामयाब होते रहे हैं अनर्गल प्रलाप कर लोगों को उकसाते हैं ताकि उनके टिप्पणी को लेकर ब्लॉगर एक पोस्ट लिखें जिनमें उनका जिक्र हो और बहुत से लोगों ने तुम्हे टी आर पी भी दान में दे दी है . किसी पो़त पर परतिक्रिया से पहले पढो पर तुम कठमुल्लों से यह आशा बेकार है . प्रवक्ता पर भी टिप्पणी देखि जिसमें मरी पोस्ट को होमो का समर्थक बताया गया है . पाठक जिन्होंने इसे पढ़ा होगा उन्हें पता है कि क्या लिखा और सेक्स /काम को लेखन में शामिल करना क्या देश के विरुद्ध है ? अरे देशद्रोही तो आप जैसे लोग होते हैं . ध्यान रहे यहाँ किसी धर्म को टारगेट कर नहीं कहा जा रहा है ,
दिनेश जी हो सकता है प्रतिक्रिया को लिखने में आगे-पीछे हो गया हो . माफ़ी चाहूँगा . मेरा मकसद केवल इस सार्थक बहस को हमारे पाठकों के बीच लाना था . क्योंकि ब्लॉगजगत में कैसी बहस होती है बगैर आलेख को पढ़े प्रतिक्रिया दे दी जाती है जिसका पोस्ट से कोई लेना देना नहीं और इसका नमूना तो आप ऊपर की प्रतिक्रिया में देख ही चुके हैं .
तुम इतने में परेशां हो मुर्ख हमने तो पूरा का पूरा ब्लॉग ही समर्पित किया है सेक्स को . वैसे तुम अच्चे आदमी हो गुरु बहुत जगह हमारा लिंक छोड़ आये . सेक्स से इतना डरते क्यों हो सेक्स नहीं होता तो दुनिया में आते कैसे ? क्या तुम्हारे माँ-बाप ने बगैर सेक्स के तुम्हे पैदा किया है .?
"स्वप्निल जी समलैंगिकता को विकृति नहीं मानते , मैं सेक्स को पाप नहीं मानता .राजेंद्र यादव और अरुंधती सरीखे काम के ज्ञाता होमो -हेट्रो सभी तरह के सेक्स को मानते हैं पर शादी को नहीं मानते .अब साहब हमारा आपका मानना कोई चिरंतन सत्य तो नहीं है .बाबा रामदेव जैसे योग गुरु और दुनिया के अनेक चिकित्सक लोगों का मानना है यह एक हार्मोनल डिसआर्डर है . रामदेव जी ने तो यहाँ तक कहा कि जब मेंटल डिसआर्डर ठीक हो सकता है ,कैंसर ठीक हो सकता है तब होमो डिसआर्डर क्यों नहीं ? खैर , ये तो चर्चा का विषय है . समाज अक्सर भटकाव का शिकार होता है . इसी देश में आज से ४-५ सौ साल पहले से अब तक का कालखंड अनेक कुरीतियों में फंसा रहा जिन्हें तत्कालीन समाज के लोग सही मानते थे .क्या तब कोई साधारण आदमी तमाम अंधविश्वासों को गलत मानने को तैयार था ? नहीं , छोटे वर्ग में फैली तमाम कुरीतियाँ/विकृतियाँ शनैः शनैः विस्तार लेती गयी .हो सकता है आज अल्पसंख्यक गे और लेस्बियन लोग कल को बहुसंख्यक हो जाएँ . वैसे भी गलत चीजों को फैलते देर नहीं लगती है . लेकिन याद रहे वो समय भी जब अपने समय से दूर भविष्य की सोचने वाले लोगों ने समाज को नई दिशा दी है . हमारा देश कई बार जगा है और अपनी निरंतरता को बनाये हुए है . स्वप्निल जी बदलाव से हम डरे नहीं .चर्चा होनी चाहिए और होमो कोई विषय नहीं है . हमारा विषय तो सेक्स और समाज है जिसमें एक पैरा होमो को मान कर चलना चाहिए . सेक्स जिस चीज के लिए आतुरता पैदा करता है उसे पा लें तो सारी झंझट ही ख़त्म ! लेकिन उस शांति को हमने छिछोरेपन में मज़े का स्वरुप दे दिया है . अपने अन्दर के प्रेम को बाहर लाने की जरुरत है .पर कैसे होगा ? हम जमीन का बाहरी आवरण हटा कर इस आस में बैठे हैं कि बारिश होगी तब पानी जमा होगा फ़िर पियेंगे .जबकि जरा सा गड्डा और खोद कर अन्दर का जाल प्राप्त हो सकता है . ठीक उसी प्रकार मन में बसे प्रेम को बाहर तलाशने से क्या होगा ? प्रेम तभी प्रकटित हो पायेगा जब उसे जगह मिल पायेगी .खाली ग्लास को पानी से भरी हुई बाल्टी में उलट कर रखने पर एक बूंद पानी नहीं जा पाती है क्योंकि उसमें पहले से वायु भरा होता है .उसी प्रकार सेक्स के दमन ने दिल-दिमाग पर सेक्स का कब्जा करवा दिया है . जब तक दिमाग को सेक्स के कब्जे से मुक्त नहीं करेंगे प्रेम प्रकट नहीं हो पायेगा . और ऐसा तभी होगा जब सेक्स को समझा जाए ,उसे अनुभव किया जाए .उस अनुभव में समय की शुन्यता और अहम् भाव की शुन्यता का मिलन होते हीं स्वयं प्रेम का प्रस्फुटन हो जायेगा"
पढ़ लिया अब बताओ इसमें होमो का मेरे द्वारा समर्थन कहाँ किया गया है ?
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